Sunday, November 16, 2014

लम्बाई







जिला अस्पतालों में स्त्री रोग विभाग की ओ पी डी के बाहर अक्सर
कभी न ख़त्म होने वाली
लम्बी लाइन लगी रहती है


ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लोग आते हैं लगा जाते हैं
लम्बाई नापने का स्केल

 चिकित्सकों की कमी के होते
इतना वक़्त किसके पास है कि औरतों को नापें

हम हिंदुस्तानी तो लिफाफा देखकर मज़मूँ जान लेते हैं
पांच फुट से कम वाली को दूर से ही पहचान लेते हैं

अँगरेज़ चले गए
पर

रूल
रूरल और
रूलर
हमारे हमारे लिए छोड़ गए 

Sunday, August 11, 2013

ढक्कन

किसी भी शीशी को खोलने के लिए उसके
ढक्कन को बड़ी जोर से घुमाना पड़ता है
अक्सर चाक़ू से उसकी नीचे की रिंग को अलग करना पड़ता है
तब जाकर खुलता है
अटूट बंधन है
सोनिया गाँधी और हमारे प्रधानमंत्री जी की तरह
काटते रहो वरना दोनों बस घूमते ही रहेंगे
एक साथ


साबुन

बर्तन मांजने का साबुन
जब नया नया खुलता है तो टिक्की जमी जमाई रहती है
चमकती हुई
अन्ना के शुरुआती आन्दोलन की तरह
धीरे धीरे उसका हलवा बनता जाता है
इस बीच नए स्टील वूल , स्कॉच बाईट आ जाते हैं
पुराने अक्सर गायब हो जाते हैं

हलवा फ़ैल फ़ैल कर
रगड़ रगड़ कर सबकी कालिख उतारता रहता है
कुछ मिटटी , पानी से मिला जुला
आम आदमी की तरह
केजरीवाल आन्दोलन की तरह

घिसते रहो
चमकाते रहो
दाग़ धब्बे दिखाते रहो
नयी टिक्की के आने तक
इसी से काम चलाते रहो



Wednesday, August 7, 2013

वीरान रास्ता






लोग  जाते  जाते 
मिटा  जाते  हैं
अपने  निशाँ
यादों  के  धुंधलाते 
निशाँ

जैसे  हरे  भरे  खेतों  में
मरी  हुई  पगडंडियाँ 
अजनबी  राहों  की
अजनबी  कहानियाँ
ये  कैसी  हैं  वीरानियाँ

इन  वीरानियों  से  होकर 
अक्सर  गुजरना  पड़ता  है
मुझे

बेरंग  से  बेनूर  रास्ते
सियाह  रात  में  जैसे
सूना  खामोश   आसमान

नस  नस  में  उतर  जाता  है 
अक्सर

कहाँ  जाते  होंगे 
ये  रास्ते

शायद  किसी 
अँधेरी  गुफा  में
जहाँ 
सूरज  का  एक  टुकडा 
तड़पता  होगा
बाहर निकलने  को
या  फ़िर 
किसी  कुएं  की  मुंडेर  तक
झांकते  हुए  अपना  अक्स  पानी  में
या  फ़िर 
किसी  पहाड़  के  साए  में 
गुम  होते
जरुर  किसी  खंडहर  में 
घुस  कर 
सो  जाते  होंगे 
ये  रास्ते

मन  करता  है
रंग  भर  दूँ  इन  में
लाल  पीले  हरे  नीले
इन्द्रधनुषी  रंग
सपनों  के  रंग
खुशबुओं  के  रंग
बारिशों  के  संग

अब  के  आओ  तो  लेते  आना
अपने  साथ

ओस  की  चमकती  बूँदें
हरी  भरी  दूब  की  नरमी
सूरज  की  गर्मी
चंदा  की  चांदनी
सितारों  की   हँसी

बागबां  से  मांग  लाना
खुशबू 
उधार

मांग  लेना   आसमान  से
लालिमा  उफक  की

ताकि  जब  जाओ  तो
जलते रहें    
यादों के  गुल ए शफ़क़ 
 बुलबुल के फानूसों की  तरह

हरदम
हरवक्त

रोशन  करते  रहें 
राहें
याद  दिलाते  रहें 
 कि 
गर्द  ए  कारवां  का  भी
रंग  होता  है
वो  सिर्फ़  दर्द  का  काफिला 
नहीं  होता  है
वीरानों  में  भी 
फूल  खिलाने  की
ताक़त  रखता  है

वीरान  रास्ता 
मुझे  बहुत  अखरता  है
अक्सर
वीरान  रास्ता 

मुझे  बहुत  अखरता  है 

Sunday, July 21, 2013

यादें






सितारों  तुम  तो  अतीत  हो
फ़िर  क्यूँ  दिखा  करते  हो 
अक्सर 
वर्तमान  में
जैसे  यादें  टंगी  हों
आसमान  में
कुछ  मरी  हुई  
लाल  सियाही  के  समान
कुछ
छोटी  छोटी 
रुई  के  फाहों  सी  सफ़ेद  यादें
आज  उगा  है  एक  और  नया  सितारा
मनो  कोई  याद  किसी  का  हाथ  छोड़कर
भाग  आई  हो
और  चिपक  गई  हो  आसमान  में
झिलमिल  सी
टिमटिमाती  सी
जिंदा  याद
झुरमुट  में  गम  होती याद
धीरे  धीरे  मरती  याद

अपने  निशान  छोड़  जाती  याद 

Sunday, January 8, 2012

इन्टरेगनम

इन्टरेगनम 

अंग्रेजी का शब्द है यह 
जब कोई संत , पादरी या जो व्यक्ति गद्दी को संभाले है 
उसे छोड़ता है तब अक्सर  
दूसरा एकदम  से प्रकट नहीं होता 
कुछ वक़्त लगता है 

यहाँ की तरह नहीं 
 क़ि राशन की लाइन लगी हो कुर्सी के लिए 

नेताओं की मूर्तियाँ तो ढँक गयीं 
हाथी भी ढँक गए 

इंटर गेनम आ गया लगता है 
कुर्सियां बेचारी थक गयी हैं 
उनकी भी सफाई होना जरुरी है 
अब समय आ गया है क़ि

कुछ वक़्त आराम दिया जाए 
काले धन को 
सफेदपोशों को 

प्रजा चल रही है चलती रहेगी 
देश चल रहा है चलता रहेगा 

सब लोग समाधि लगायें 
चिंतन मनन करें 

जब कोहरा छंट जाए 
समाधि टूट जाए 

तो शायद कोई महापुरुष सपनों में आये 
लोगों के दिलों को भाये
उसे वो कुर्सी पर बिठाएं 
इंटर गेनम 2012 का नाम 
इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखवायें 

Tuesday, January 3, 2012

barf





पहाड़ों पर 
अक्सर लोग 
कहते हैं कि जब राजा परिक्रमा पूरी कर के अपने घर जाते हैं 
तब बर्फ गिरती है 

दिल्ली के राजाओं ने भी बहुत कर ली परिक्रमा 
न जाने किन किन देवियों के गले मिल कर रो लिए 

अब घर जा कर आराम फरमाएं 
तो स्वर्ग से बरसात हो 
और दो घड़ी चैन से सोती कायनात हो