Sunday, September 6, 2009

रक्त







धमनी से निकला रक्त
चमकीला लाल होता है
यह झटके से बाहर निकलता है

शिरा के फटने पर
गहरा लाल रक्त
बंधी हुई धारा में निकलता है

दोनों का मिला हुआ रक्त
घाव के तले से उमड़ पड़ता है


अधिकांश धमनियां और शिराएं
पास पास पड़ी होती हैं
हिन्दू- मुस्लमान की तरह
दोनों अक्सर
एक साथ चोट खा जाती हैं




5 comments:

  1. अरे....!! ये मैं कहाँ आ गया......यहाँ तो शब्दों की बड़ी ही खूबसूरत गंगा बही जा रही है.....राम....राम....राम.....!!क्या खूब......वाह......खुबसूरत.....सुन्दर.....चल हट भूतनाथ इन सब सब्दों का तकरीबन एक ही अर्थ है.......ओह तब मैं क्या कहूँ.....??लो सर्वर भी डाउन हो गया.......आपने आच्छा लिखा है....सच....सच्ची......!!

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  2. अधिकांश धमनियां और शिराएं
    पास पास पड़ी होती हैं
    हिन्दू- मुस्लमान की तरह
    दोनों अक्सर
    एक साथ चोट खा जाती हैं
    ...यह बात कोई डॉक्टर ही कह सकता है...और आपने कहा। आप सही मायने में सोशल डॉक्टर हैं।

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  3. धन्यवाद यूसुफ जी !

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  4. धन्यवाद भूतनाथ जी !

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  5. क्या कहूँ..सोच रहा हूँ कि क्या इस कविता को उन धमनियों और शिराओं ने भी पढ़ा होगा क्या..जिनका रक्त बह रहा है आज.. उनकी ही बेखयाली मे!!

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