Saturday, September 5, 2009

सूखा जख्म




जब तक न काटें
ठीक नहीं होता
कई परतें मिलती हैं
खाने एक दूसरे से सटे पर
कटे कटे
इन परतों को तोड़ना पड़ता है
सब खानों को
फिर से एक करना पड़ता है
जख्म को
ताज़ा करना पड़ता है
तभी वह
ठीक से भर पाता है




4 comments:

  1. आपकी रचनाएं लाजवाब हैं। हिंदी ब्लॉगजगत में आपका तहेदिल से स्वागत है।

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  2. धन्यवाद , शुक्रिया , मेहरबानी !

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  3. अरे....!! ये मैं कहाँ आ गया......यहाँ तो शब्दों की बड़ी ही खूबसूरत गंगा बही जा रही है.....राम....राम....राम.....!!क्या खूब......वाह......खुबसूरत.....सुन्दर.....चल हट भूतनाथ इन सब सब्दों का तकरीबन एक ही अर्थ है.......ओह तब मैं क्या कहूँ.....??लो सर्वर भी डाउन हो गया.......आपने आच्छा लिखा है....सच....सच्ची......!!dhatt swikrti bhi chaaiye....lekin ham to kahin bhi jaa sakte hain....!!

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