Saturday, September 5, 2009

वो





मेरे सामने की कुर्सी पर


आकर बैठती है
रोज़ मेरी मेज़ पर


पेन से गोले बनाती है
छोटे गोले
बड़े गोले
आधे तिरछे गोले
बस बनाती चली जाती है
और कुछ कुछ बोलती जाती है
मैं मना नहीं कर पाती
गोलों में उसका मन जो दिखता है


हाँ मेज़ को रोज़


साफ़ करवाना नहीं भूलती




आज वो आई नहीं
मेज़ चमक रही है
गोलों की प्रतीक्षा में





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