Friday, October 2, 2009

नज़र






रावण आजकल बड़ी जल्दी
आग पकड़ लेता है
चारों तरफ़ गर्मी जो है

आग ही आग
धुआं ही धुआं

पेट की आग
हवन कुंडों की आग

आहुतियों का रेला
ख़त्म ही नहीं होता

लाल मिर्च
की धांस से
खांसते खांसते दम निकलने
लगता है
बेतहाशा आंसू निकल पड़ते हैं

बापू की तस्वीर से

तुम सचमुच
बुढा गए हो बापू
जन्मदिन
से पहले ही

कहाँ लगी
है नज़र

नज़र लगती है
तब सबकुछ
चुपचाप स्वाहा हो जाता
है

देखो
तुम्हारा फूंका विभाजन-मन्त्र
जिन्दा तो है

हाँ उसका जोड़ तोड़
उसकी भाषा
उसका गणित
सब
तुम्हारे चेहरे की झुर्रियों से
बहुत आगे निकल आए हैं
तुम्हारी आँखें
भला इसे कहाँ बांच पाएंगीं
तुम गूगलमय
जो हो गए हो

3 comments:

  1. तुम्हारा फूंका विभाजन मंत्र जिन्दा तो है ,बहुत खूब,
    डॉ. मिनोचा

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  2. किसी भी बहाने बापू याद तो किए ही जा रहे हैं। वाह री दुनिया। पाकिस्तान बनाने वाले जिन्ना को अब सर आंखों पर बैठा रहे हैं भगवाधारी और बापू को मिल रही हैं गालियां।
    ...मिलावट करने वाले, डंडी मारने वाले डांडी मार्च करने वाले को कोस रहे हैं। कितना बदल गया है इंसान।

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  3. तुम्हारे चेहरे की झुर्रियों से
    बहुत आगे निकल आए हैं
    तुम्हारी आँखें
    भला इसे कहाँ बांच पाएंगीं
    तुम गूगलमय
    जो हो गए हो

    बापू को एक नए रूप में आँका आपने ....!!

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