Friday, October 8, 2010

हदें

यदि पेंसिल से एक
लक्ष्मण रेखा खींची जाए तो
चींटियाँ
भी उसे पार नहीं करती हैं
पर इंसान हदें पार करता ही जाता है
चाहे वह घर हो
दफ्तर हो
मंदिर- मस्जिदें हों
या कि फिर हों
सरहदें

Sunday, September 26, 2010

दौड़


अक्सर
सब कामों के दलाल होते हैं
प्रोपर्टी के
प्लेसमेंट के
पासपोर्ट के
शेयर मार्केट के
अस्पतालों के
इन सबकी तो रोटी की दौड़ है


पर राजनेता होते हैं
सबसे बड़े दलाल
जो करते हैं देश को हलाल
इनकी दौड़ तो बेजोड़ है
बस आपसी होड़ है

हंसी


एक तरफ पार्क में सुबह सुबह योगा करते लोग
बेतहाशा हँसते
अपने नर्म नर्म हाथों से
तालियाँ बजाते


दूसरी तरफ अक्सर मंदिर के आगे
भंडारे के लिए खड़े लोग


अपने खुरदुरे
मेहनतकश हाथों से प्रसाद लेते
माथे पर शाम की रोटी की चिंता
बस पकड़ने की चिंता


क्या इन्हें सिखायेंगे हँसना और तालियाँ बजाना
नहीं ?
क्यूँ
डर लगता है न ?

Tuesday, August 31, 2010

शनि

कहते हैं कि शनि के तेल में सिक्का ऐसे डालो कि
आवाज़ न करे

कितना ही धीरे डालो
अक्सर
आवाज़ करता है
सिक्का है
खनकेगा ही
अपना काम करेगा ही
सब अपना काम ही तो कर रहे हैं
शनि महाराज
तेल
डोलची
गरीब बच्चों के हाथ
और
हमारा डर

प्रतिशत


अक्सर सोचती हूँ कि
ये प्रतिशत न होता तो क्या होता
70-30
नहीं 60-40
'नथिंग इस इन्डिसपेंसिबिल'

ठीक है...

पूर्वजों का कहा मान रहे हैं
सब मिल बाँट कर ही तो
खा रहे हैं
आफ्टर ऑल
'we are FAMILY '
हो रहा भारत निर्माण ....
जब जब भी यह गाना बजता है
सड़क के गड्ढों पर
अक्सर
कोई न कोई फिसल जाता है


तबाही

डेंगू ने तबाही मचाई है ......

हर कोई चूसने में लगा है
मच्छर
खून को
कॉरपोरेट हस्पताल
डाक्टर को
मेडिक्लेम पॉलिसी
हस्पतालों को
और आई सी यू वार्ड
आखिरी बूँद को