Friday, October 8, 2010

हदें

यदि पेंसिल से एक
लक्ष्मण रेखा खींची जाए तो
चींटियाँ
भी उसे पार नहीं करती हैं
पर इंसान हदें पार करता ही जाता है
चाहे वह घर हो
दफ्तर हो
मंदिर- मस्जिदें हों
या कि फिर हों
सरहदें

11 comments:

  1. सहमत हूँ. आपने सही कहा .
    बहुत बढ़िया.

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  2. बेहतरीन रचना। बधाई।

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  3. bahut badhiya kavita.. gambhir baat kah dee aap.. adbhud...

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  4. aap sabko achhi lagi iske liye bahut bahut dhanyavad

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  5. जानदार और शानदार की प्रस्तुति हेतु आभार।
    =====================
    कृपया पर्यावरण संबंधी इस दोहे का रसास्वादन कीजिए।
    ==============================
    शहरीपन ज्यों-ज्यों बढ़ा, हुआ वनों का अंत।
    गमलों में बैठा मिला, सिकुड़ा हुआ बसंत॥
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

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  6. shukriya dr lakhnavi ji , gamlon mein baitha hua basant...waah

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  7. एक बेहतरीन रचना ।
    काबिले तारीफ़ शव्द संयोजन ।
    बेहतरीन अनूठी कल्पना भावाव्यक्ति ।
    सुन्दर भावाव्यक्ति । साधुवाद ।

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