Sunday, August 11, 2013

साबुन

बर्तन मांजने का साबुन
जब नया नया खुलता है तो टिक्की जमी जमाई रहती है
चमकती हुई
अन्ना के शुरुआती आन्दोलन की तरह
धीरे धीरे उसका हलवा बनता जाता है
इस बीच नए स्टील वूल , स्कॉच बाईट आ जाते हैं
पुराने अक्सर गायब हो जाते हैं

हलवा फ़ैल फ़ैल कर
रगड़ रगड़ कर सबकी कालिख उतारता रहता है
कुछ मिटटी , पानी से मिला जुला
आम आदमी की तरह
केजरीवाल आन्दोलन की तरह

घिसते रहो
चमकाते रहो
दाग़ धब्बे दिखाते रहो
नयी टिक्की के आने तक
इसी से काम चलाते रहो



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